वाजिब गुस्ल

इंसान के सात ग़ुस्ल वाजिब हैं।

1. ग़ुस्ले जनाबत(यह वह ग़ुस्ल है, जो किसी भी प्रकार से मनी (मनी) निकलने के बाद किया जाता है।)
2. ग़ुस्ले हैज़ (यह वह ग़ुस्ल है, जो स्त्री मासिक धर्म समाप्त होने के बाद करती है।)
3. ग़ुस्ले निफ़ास (यह वह ग़ुस्ल है, जो स्त्री बच्चा पैदा होने के बाद करती है।)
4. ग़ुस्ले इस्तेहाज़ा (यह वह ग़ुस्ल है, जो स्त्री हैज़ व निफ़ास के अतिरिक्त अन्यखून आने पर करती है।)
5. ग़ुस्ले मसे मय्यित (यह वह ग़ुस्ल है, जो किसी मुर्दा इंसान को छूने के बाद किया जाता है।)
6. ग़ुस्ले मय्यित (यह वह ग़ुस्ल है, जो मुर्दा इंसान को दिया जाता है।)
7. मन्नत व क़सम आदि के कारण वाजिब होने वाला ग़ुस्ल।

जनाबत (संभोग) के अहकाम

347 इंसान दो चीज़ों से जुनुब होता है।
एक- जनाबत (संभोग) से
दूसरे- मनी(मनी) निकल जाने से, चाहे वह सोते हुए निकले या जागते हुए, कम निकले या ज़्यादा, मस्ती के साथ निकले या बिना मस्ती के, चाहे इंसान उसे अपने इख़्तियार से निकाले या वह खुद निकल जाये।
348  अगर किसी इंसान के पेशाब के मक़ाम से कोई तरी निकले और मालूम न हो कि यह तरी मनी (मनी) है या पेशाब या कोई और चीज़, तो अगर वह तरी मस्ती के साथ व उछल कर निकली हो और उसके निकलने के बाद बदन सुस्त हो गया हो, तो वह तरी मनी के हुक्म में है। लेकिन अगर इन तीनों निशानियाँ या इनमें से कुछ मौजूद न हो, तो वह तरी मनी के हुक्म में नही है। लेकिन अगर इंसान बीमार हो, तो ज़रूरी नही है कि वह तरी उछल कर निकले, बल्कि अगर मस्ती के साथ बाहर निकले, तो वह मनी के हुक्म में होगी और उसके निकलने के बाद बदन का सुस्त होना भी ज़रूरी नही है।
349 इंसान के लिए मुस्तहब है कि मनी निकलने के बाद पेशाब करे और अगर पेशाब न करे व ग़ुस्ल करने के बाद उसके पेशाब के रास्ते से कोई ऐसी तरी निकले जिसके बारे में न जानता हो कि यह मनी है या कोई और चीज़, तो वह तरी मनी के हुक्म में होगी।
350  अगर कोई इंसान जिमाअ(संभोग) करे और उसका लिंग ख़तने की जगह तक (यानी सुपारी तक) या उससे ज़्यादा अन्दर चला जाये, तो जिसके साथ जिमाअ किया जाये चाहे वह औरत हो या मर्द, जिमाअ पीछे के रास्ते से किया जाये या आगे के रास्ते से, वह बालिग़ हों या नाबालिग़, मनी निकले या न निकले, वह दोनो जुनुब हो जायेंगे।
351  अगर किसी को शक हो कि उसका लिंग सुपारी तक अन्दर गया है या नही, तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नही है।
352  अगर कोई इंसान किसी जानवर के साथ संभोग करे (खुदा न करे कि ऐसा हो) और उसकी मनी निकल जाये, तो ग़ुस्ल कर लेना ही काफ़ी है। और अगर मनी न निकले और वह संभोग से पहले वुज़ू से हो, तब भी ग़ुस्ल करना ही काफ़ी है। लेकिन अगर वुज़ू से न हो, तो एहतियाते वाजिब यह है कि ग़ुस्ल और वुज़ू दोनों अंजाम दे।
353  अगर मनी अपनी जगह से हिल जाये, मगर बाहर न निकले या इंसान को शक हो कि मनी निकली है या नही, तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नही है।
354 अगर कोई इंसान ग़ुस्ल न कर सकता हो और उसके लिए तयम्मुम करना मुमकिन हो, तो वह नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने के बाद अपनी बीवी से बिला वजह जिमाअ नही कर सकता। लेकिनअगर लज़्ज़त हासिल करने या अपने नफ़्स से किसी ख़तरे को दूर करने के लिए ऐसा करे तो कोई हरज नही है।
355 अगर कोई इंसान अपने कपड़ों पर मनी लगी देखे और यह भी जानता हो कि यह उसकी अपनी मनी है और उसने इसके निकलने के बाद ग़ुस्ल भी न किया हो, तो उसे चाहिए कि ग़ुस्ल करे और जिन नमाज़ों के बारे में उसे यक़ीन हो कि उसने इन्हें इसी हालत में पढ़ा है, उनकी कज़ा करे। लेकिन जिन नमाज़ों के बारे में एहतेमाल हो कि मनी निकलने के बाद पढ़ी थीं, उनकी कज़ा लाज़िम नही है।।

वह काम जो मुजनिब पर हराम है।

356  मुजनिब इंसान पर पाँच काम हराम हैं।
1. क़ुरआने करीम के अलफ़ाज और अल्लाह के नाम को छूना। एहतियाते वाजिब की बिना पर पैग़म्बरों और आइम्मा-ए- मासूमीन अलैहिमु अस्सालाम के नाम भी इसी हुक्म में आते हैं।
2. मस्जिदुल हराम व मस्जिदुन नबी में जाना, चाहे एक दरवाज़े से दाख़िल हो कर दूसरे दरवाज़े से बाहर निकलना ही क्योँ न हो।
3. आम मस्जिदों में रुकना, लेकिन एक दरवाज़े से दाख़िल हो कर दूसरे दरवाज़े से निकलने और मस्जिद के अन्दर से कोई चीज़ उठाने के लिए, उसमें दाख़िल होने में कोई हरज नही है। एहतियाते वाजिब यह है कि आइम्मा-ए- मासूमीन अलैहिमु अस्सलाम के हरम में भी न रुका जाये और बेहतर यह है कि इमामों के हरम में मस्जिदुल हराम और मस्जिदे नबी के हुक्म की रिआयत की जाये।
4. मस्जिद में कोई चीज़ रखने के लिए दाख़िल होना।
5. कुरआने करीम के वाजिब सजदे वाले सूरों को पढ़ना और वह चार सूरेह हैं- (क) सूर-ए-अलिफ़ लाम तनज़ील (ख) सूर-ए- हाम मीम सजदह (ग) सूर-ए-वन नज्म (घ) सूर-ए-अलक़, इन सूरों में से एक हर्फ़ पढ़ना भी हराम है।
वह काम जो मुजनिब के लिए मकरूह हैं।
357  मुजनिब इंसान के लिए इन नौ कामों को करना मकरूह हैं।
1. खाना
2. पीना, लेकिन अगर वुज़ू कर लिया जाये, तो खाना पीना मकरूह नही है।
3. कुरआने करीम के उन सूरों की सात से ज़्यादा आयतें पढ़ना, जिनमें वाजिब सजदा नही है।
4. कुरआने करीम की जिल्द, हाशिये या अलफ़ाज़ के बीच की ख़ाली जगह को छूना।
5. कुरआने करीम को अपने साथ रखना।
6. सोना- लेकिन अगर वुज़ू कर लिया जाये या पानी न होने की सूरत में ग़ुस्ल के बदले तयम्मुमकर लिया जाये, तो सोना मकरूह नही है।
7. मेंहदी या इससे मिलती जुलती किसी चीज़ से ख़िज़ाब करना।
8. बदन पर तेल की मालिश करना।
9. एहतेलाम(स्वप्न दोष) हो जाने के बाद जिमाअ (संभोग) करना।

ग़ुस्ले जनाबत

358 ग़ुस्ले जनाबत एक मुस्तहब ग़ुस्ल है, लेकिन वाजिब नमाज़ और ऐसी ही दूसरी इबादतों के लिए वाजिब हो जाता है। नमाज़े मय्यित,सजदा-ए-सह्व , सजद-ए-शुक्र और कुरआने मजीद के वाजिब सजदों के लिए ग़ुस्ले जनाबत ज़रूरी नही है।
359 ज़रूरी नही है कि इंसान ग़ुस्ल के वक़्त नियत करे कि वाजिब यामुस्तहब ग़ुस्ल कर रहा हूँ, बल्कि अगर अल्लाह की कुरबत के इरादे से यानी अल्लाह के हुक्म पर अमल पर करने के इरादे से ग़ुस्ल करे तो काफ़ी है।
360 ग़ुस्ले चाहे वाजिब हो या मुस्तहब दो तरीक़ों से किया जा सकता है हैं।
(अ) तरतीबी
(आ) इरतेमासी।

ग़ुस्ले तरतीबी

361 ग़ुस्ले तरतीबी में नियत के साथ पहले सर व गर्दन उसके बाद दाहिना हिस्सा और बाद में बाँया हिस्सा धोना चाहिए। अगर कोई इंसान, जान बूझ कर या भूलने की वजह से या मसला न जानने की बिना पर इस तरतीब पर अमल न करे, तो उसका ग़ुस्ल बातिल है।
362 आधी नाफ़ और आधी शर्म गाह को दाहिना हिस्सा धोते वक़्त और आधी बाक़ी को बाँया हिस्सा धोते वक़्त धोना चाहिए। बल्कि बेहतर यह है कि दाहिने और बाँये दोनों हिस्सों को धोते वक़्त नाफ़ व शर्म गाह को पूरा पूरा धोया जाये।
363 इंसान को यह यक़ीन करने के लिए कि उसने सर व गर्द और बदन के दाहिने व बायेँ हिस्से को पूरा धो लिया है, उसे चाहिए कि हर हिस्से को धोते वक़्त उसके बाद वाले हिस्से को भी थोड़ा धो ले। बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि दाहिना हिस्सा धोते वक़्त गर्दन को दाहिनी तरफ़ से और बाँया हिस्सा धोते वक़्त गर्दन को बायीं तरफ़ से धोया जाये।
364 अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल करने के बाद पता चले कि बदन कुछ हिस्सा बग़ैर धुले रह गया है, लेकिन उसे यह मालूम न हो कि कौनसा हिस्सा रह गया है, तो उसे दोबारा ग़ुस्ल करना चाहिए।
365 अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल के बाद मालूम हो कि बदन की कुछ जगह बग़ैर धुले रह गयी है, तो अगर वह जगह बायीं तरफ़ की है तो सिर्फ़ उस जगह का धोना काफ़ी है। लेकिन अगर वह जगह दाहिनी तरफ़ रह गयी है, तो उस जगह को धोने के बाद, बायीं तरफ़ को दोबारा धोना चाहिए।
366 अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल पूरा होने से पहले शक हो कि बायीं तरफ़ का कुछ हिस्सा बग़ैर धुले रह गया है, तो उस हिस्से को धो लेना ही काफ़ी है। लेकिन अगर उसे बायाँ हिस्सा धोते वक़्त दाहिने हिस्से या उसकी किसी जगह के बारे में शक हो या दाहिना हिस्सा धोते वक़्त सर या गर्दन या उनके किसी हिस्से के बारे में शक हो, तो उस शक की परवा नही करनी चाहिए।

ग़ुस्ले इरतेमासी

367 ग़ुस्ले इरतेमासी में पूरे बदन को एक साथ पानी डुबाना चाहिए। अगर कोई ग़ुस्ले इरतेमासी की नियत से पानी में एक दफ़ा या तदरीजी दाखिल हो, ताकि पूरा बदन पानी में डूब जाये, तो उसका ग़ुस्ल सही है।
368 ग़ुस्ले इरतेमासी में अगर पूरा बदन पानी में हो और इंसान ग़ुस्ल की नियत करके बदन को पानी में हिलाये तो उसका ग़ुस्ल सही है। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि बदन का ज़्यादा हिस्सा पानी से बाहर हो और नियत करके पानी में दाख़िल हुआ जाये।
369 अगर ग़ुस्ले इरतेमासी करने के बाद पता चले कि बदन के किसी हिस्से तक पानी नही पहुँच पाया है, तो चाहे उस हिस्से के बारे में इल्म हो या न हो, दोबारा ग़ुस्ल करना चाहिए।
370 अगर किसी इंसान के पास ग़ुस्ले तरतीबी के लिए वक़्त न हो और ग़ुस्ले इरतेमासी कर सकता हो, तो उसे ग़ुस्ले इरतेमासी ही करना चाहिए।
371 रोज़े और हज व उमरे का एहराम बाँधे होने की हालत में, इंसान ग़ुस्ले इरतेमासी नही कर सकता, लेकिन अगर वह भूले से ग़ुस्ले इरतेमासी कर ले, तो उसका ग़ुस्ल सही है।

ग़ुस्ल के अहकाम

372 ग़ुस्ल इरतेमासी में ग़ुस्ल से पहले पूरे बदन का पाक होना ज़रूरी है। लेकिन ग़ुस्ले तरतीबी में पूरे बदन का पाक होना ज़रूरी नही है। अगर पूरा बदन नजिस हो, तो हर हिस्से को ग़ुस्ल देने से पहले उसे पाक किया जा सकता है।
373 हराम तरीक़े से जुनुब होने वाले का पसीना नजिस नही है, अगर वह गर्म पानी से भी ग़ुस्ल करे तो सही है।
374      ग़ुस्ल में अगर जिस्म का बाल बराबर हिस्सा भी बग़ैर धुला रह जाये तो ग़ुस्ल बातिल है। लेकिन दिखाई न देने वाले हिस्सों को धोना ज़रूरी नही है जैसे कान व नाक के अन्दुरूनी हिस्से वग़ैरा।
375 किसी इंसान को शक हो कि बदन का यह हिस्सा ज़ाहिरी (बाहरी) है या बातिनी (अन्दुरूनी) तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसे धोया जाये। लेकिन अगर पहले बातिनी हिस्सा हो और अब शक हो रहा हो कि यह ज़ाहिरी में बदला है या नही, तो उसे धोना लाज़िम नही है।
376 अगर कान का बाली पहनने वाला सुराख़ या इसी जैसा कोई और सुराख इतना बड़ा हो कि उसका अन्दरूनी हिस्सा दिखाई देता हो और वह बदन का ज़ाहिरी हिस्सा समझा जाता हो, तो उसे धोना चाहिए। लेकिन अगर उसका अन्दरूनी हिस्सा दिखाई न देता हो और वह बाहरी हिस्सा न समझा जाता हो, तो उसे धोना ज़रूरी नही है।
377 अगर बदन पर कोई ऐसी चीज़ लगी हो, जो खाल तक पानी के पहुँचने में रुकावट हो, तो उसे साफ़ कर देना चाहिए। अगर उसके साफ़ होने का यक़ीन किये बग़ैर ग़ुस्ल कर ले, तो ग़ुस्ल जायज़ नही है।
378 अगर ग़ुस्ल करते वक़्त इंसान को शक हो कि बदन पर कोई ऐसी चीज़ तो मौजूद नही है, जो बदन तक पानी के पहुँचने में रुकावट हो, तो अगर उसका यह शक अक़ली तौर पर सही हो, तो उसे मुतमइन होने के लिए देख भाल कर लेनी चाहिए।
379 ग़ुस्ल में बदन का जुज़ माने जाने वाले छोटे बालों का धोना ज़रूरी है और एहतियात की बिना पर बड़े बालों को भी धोना चाहिए।
380 वह तमाम शर्तें जो वुज़ू के सही होने के लिए बयान की गई हैं, जैसे पानी का पाक होना, ग़स्बी न होना आदि, वह तमाम ग़ुस्ल के सही होने के लिए भी शर्त है। लेकिन ग़ुस्ल में यह ज़रूरी नही है कि बदन को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोया जाये। ग़ुस्ले तरतीबी में यह भी ज़रूरी नही है कि एक हिस्से को धोने के फ़ौरन बाद दूसरे हिस्से को धोया जाये। बल्कि अगर सर व गर्दन को धोने के बाद कुछ देर रुक जाये और बाद में दाहिनी तरफ़ को धोये और कुछ देर के बाद बाँये हिस्से को धोये, तो कोई हरज नही है। मगर मुस्तहज़ा औरत इसमें शामिल नही है उसके अहकाम बाद में बयान किये जायेंगे।
381 अगर कोई इंसान हमाम वाले को पैसे न देने का इरादा किये हुए, या हमाम वाले से यह पूछे बग़ैर कि वह उधार पर राज़ी है या नही, ग़ुस्ल कर ले, तो अगर वह बादमें हमाम वाले को राज़ी भी कर ले तब भी उसका ग़ुस्ल बातिल है।
382 अगर ग़ुस्ल करने वाला का इरादा यह हो कि वह हम्माम वाले को हराम माल से या ख़ुम्स न निकले हुए माल से पैसे देगा, तो इसका ग़ुस्ल बातिल है।
383 अगर हम्माम वाला ग़ुस्ल के पैसे उधार करने पर राज़ी हो, लेकिन ग़ुस्ल करने वाले का इरादा यह हो कि उसके पैसे नही देगा या हराम माल से अदा करेगा, तो उसका ग़ुस्ल बातिल है।
384 अगर कोई इंसान हमाम के हौज़ के पानी से पखाने की तहारत करे और ग़ुस्ल करने से पहले शक करे कि  चूँकि उसने हमाम के हौज़ के पानी से तहारत की है, लिहाज़ हमाम वाला उसके ग़ुस्ल करने पर राज़ी है या नही, तो अगर वह ग़ुस्ल से पहले हमाम वाले को राज़ी कर ले, तो उसका ग़ुस्ल सही है, वरना बातिल है।
385  अगर कोई शक करे कि उसने ग़ुस्ल किया है या नही, तो उसे ग़ुस्ल करना चाहिए। लेकिन अगर ग़ुस्ल करने के बाद शक करे कि उसने जो ग़ुस्ल किया है वह सही है या ग़लत, तो उसके लिए दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नही है।
386  अगर ग़ुस्ल करते वक़्त कोई हदसे असग़र सर ज़द हो जाये, मसलन वह पेशाब कर दे तो, उसे चाहिए कि ग़ुस्ल को पूरा करे और बाद में वुज़ू करले। बेहतर यह है कि जो ग़ुस्ल उसके ज़िम्मे है उसकी नियत से दोबारा करे लेकिन ग़ुस्ल के बाद वुज़ू करना इस सूरत में भी वाजिब है।
387 अगर कोई इस ख़्याल से कि अभी उसके पास ग़ुस्ल व नमाज़ का वक़्त बाक़ी है, ग़ुस्ल करे और ग़ुस्ल के बाद समझे कि उसके पास ग़ुस्ल के लिए वक़्त नही था ,तो उसका ग़ुस्ल सही है।
388 अगर जुनुब इंसान शक करे कि उसने ग़ुस्ल किया है या नही, तो जो नमाज़े वह पढ़ चुका है, सही हैं, लेकिन बाद वाली नमाज़ों के लिए ुसे ग़ुस्ल करना चाहिए।
389  जिस इंसान पर कई ग़ुस्ल वाजिब हो, वह उन सब की नियत से एक ग़ुस्ल भी कर सकता है और उन्हे अलग अलग भी कर सकता है।
390   अगर किसी के बदन पर क़ुरआने करीम की कोई आयत  या अल्लाह का नाम लिख़ा हो या खाल में कंदा हो, तो उसे चाहिए कि जुनुब होने से पहले उन्हे साफ़ करे वरना वाजिब है कि जुनुब होने के फ़ौरन ग़ुस्ल करे और ग़ुस्ले करते वक़्त इस बात का ध्यान रखे कि हाथ को उन अलाफ़ाज़ पर न फेरे बल्कि उन पर फ़क़त पानी जारी करे।
391 जिस इंसान ग़ुस्ले जनाबत किया हो उसे नमाज़ के लिए वुज़ू नही करना चाहिए। बल्कि ग़ुस्ले इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता के अलावा अन्य वाजिब ग़ुस्लों के बाद वुज़ू किये बग़ैर नमाज़ पढ़ सकता है। जबकि बेहतर यह लहै कि वुज़ू करे।
[1] मनी निकलने के बाद, ग़ुस्ल या तयम्मुम करने से पहले इंसान मुजनिब कहलाता है।

इस्तेहाज़ा

औरत को जो ख़ूनों आते हैं, उनमें से एक ख़ूने इस्तेहाज़ा है। जब औरत को यह ख़ून आता है, तो उसे मुस्तेहाज़ा कहते हैं।
मस्ला न.392) इस्तेहाज़ा का ख़ून अक्सर ज़र्द रंग का और ठंडा होता है। यह बग़ैर जलन और दबाव के बाहर आता है और गाहड़ा भी नही होता। लेकिन इसका यह गाहड़ा, लाल या काले रंग का हो और जलन व दबाव के साथ बाहर आना भी मुमकिन है।
मस्ला न. 393) कुल्ली तौर पर यह कहा जा सकता है कि अगर किसी औरत को ख़ून आये और वह ख़ून ज़ख़्म, हैज़ या निफ़ास का न हो, तो वह ख़ूने इस्तेहाज़ा है। चाहे उसमें ऊपर बयान किये गये सिफ़ात पाये जाते हों या न पाये जाते हों।
मस्ला न.394) इस्तेहाज़ा की तीन क़िस्में हैं।
    क़लीला- अगर ख़ून सिर्फ़ रूई की ऊपरी सतह को ही गीला करे, तो यह इस्तेहाज़ा क़लीला है।
    मुतवस्सेता- अगर ख़ून रूई में दाख़िल हो जाये, लेकिन उस कपड़े तक न पहुँचे, जिसे औरते अमूमन खून को फैलने से रोकने के लिए बाँध लेती हैं, तो यह इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता है।
    कसीरा- अगर ख़ून रूई के दूसरी तरफ़ पार हो जाये तो यह इस्तेहाज़ा कसीरा है।

इस्तेहाज़ा के अहकाम

मस्ला न.395) इस्तेहाज़ा क़लीला में औरत को हर नमाज़ से पहले वुज़ू करना चाहिए और अगर शर्मगाह के ऊपरी हिस्से पर ख़ून लग गया हो, तो उसे भी धोना चाहिए। एहतियाते वाजिब यह है कि जो रूई वग़ैरा शर्मगाह पर रखी हो उसे बदल दें या धोलें।
मस्ला न.396) अगर नमाज़ पढ़ने से पहले या नमाज़ पढ़ते वक़्त औरत को  इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता हो जाये, तो उस नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करे। लेकिन इस्तेहाज़ -ए- मुतवस्सेता में अगर नमाज़े सुबह से पहले ग़ुस्ल कर लिया जाये तो अगले रोज़ सुबह तक हर नमाज़ से पहले वह काम करे जो इस्तेहाज़ -ए- क़लीला में किये जाते हैं। लेकिन अगर जान बूझ कर या भूले से सुबह की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल न करे तो ज़ोह्र व अस्र से पहले ग़ुस्ल करे और अगर इनके लिए भी ग़ुस्ल न किया हो तो मग़रिब व इशा की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करे।
मस्ला न. 397) इस्तेहाज -ए- कसीरा में उन कामों के अलावा जो इस्तेहाज़ -ए- मुतवस्सेता में किये जाते हैं यह भी ज़रूरी है कि हर नमाज़ से पहले ख़ून को जज़्ब करने के लिए रखे गये कपड़े को बदले या धोये और एक ग़ुस्ल नमाज़े ज़ोह्र व अस्र से पहले और एक ग़ुस्ल नमाज़े मग़रिब व इशा से पहले करे। नमाज़े ज़ोहर व अस्र के बीच फ़ासला न करे और अगर फ़ासला करे तो नमाज़े अस्र के लिए दोबारा ग़ुस्ल करे। इसी तरह नमाज़े मग़रिब व इशा में भी फ़ासला न करे और अगर फ़ासला करे तो इशा से पहले दोबारा ग़ुस्ल करे।
मस्ला न. 398) अगर नमाज़ के वक़्त से पहले इस्तेहाज़ -ए- कसीरा व मुतवस्सेता का ख़ून आये और रुक जाये, तो एहतियाते वाजिब की बिना पर नमाज़ के लिए ग़ुस्ल व वुज़ू करे। लेकिन अगर उसने ग़ुस्ल कर लिया हो और ग़ुसिल करने से पहले ख़ून आना मुकम्मल तौर पर बंद हो गया हो, तो नमाज़ से पहले वुज़ू कर लेना ही काफ़ी है।
मस्ला न. 399) मुसतेहाज़ -ए- मुतवस्सेता कि जिसके लिए वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों ज़रूरी है, वह जिसे चाहे पहले अंजाम दे सकती दोनों हालतें सही हैं, लेकिन बेहतर यह है कि पहले वुज़ू करे।
मस्ला न. 400) अगर इस्तेहाज़ -ए- क़लीला सुबह की नमाज़ के बाद मुतवस्सेता में बदल जाये, तो उसे ज़ोहर व अस्र की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना चाहिए। अगर ज़ोहर व अस्र की नमाज़ के बाद क़लीला मुतवस्सेता में बदल जाये तो मगह़रिब व इशा की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना चाहिए। अगर ग़ुस्ल के बाद भी इस्तेहाज़ -ए- मुतवस्सेता जारी रहे तो अगले दिन की नमाज़े सुबह से पहले दो बार ग़ुस्ल करे।
मस्ला न.401) अगर इस्तेहाज़ -ए- क़लीला या मुतवस्सेता सुबह की नमाज़ के बाद कसीरा में बदल जाये तो एक ग़ुस्ल ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ से पहले और एक ग़ुस्ल मग़रिब व इशा की नमाज़ से पहले करना चाहिए। और अगर ज़ोहर व अस्र की नमाज़ के बाद कसीरा में बदले तो मग़रिब व इशा की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना चाहिए। इसी तरह अगले रोज़ की नमाज़े सुबह से पहले भी ग़ुस्ल करना चाहिए। लेकिन अगर ग़ुस्ले शब के बाद कसीरा क़लीला में बदल जाये या बिल्कुल बंद हो जाये तो, नमाज़े सुबह से पहले ग़ुस्ल ज़रूरी नही है।
मसला न. 402) मुस्तेहाज़ा औरत को हर नमाज़ से पहले वुज़ू करना चाहिए, चाहे नमाज़ वाजिब हो या मुस्तहब, और अगर किसी पढ़ी हुई नमाज़ को एहतियातन दोबारा पढ़ना चाहे या किसी फ़ुरादा पढ़ी हुई नमाज़ को दोबारा जमाअत के साथ पढ़ना चाहे, तो उन तमाम कामों को अंजाम दे जो इस्तेहाज़ा के लिए बयान किये गये हैं। लेकिन नमाज़े एहतियात, भूले हुए सजदे व तशाहुद, सजद -ए- सह्व वग़ैरा को नमाज़ के फ़ौरन बाद अंजाम दे, तो इस्तेहाज़ा के कामों को दोबारा अंजाम देना ज़रूरी नही है।
मस्ला न. 403) अगर मुस्तेहाज़ा औरत का ख़ून मुकम्मल बंद हो जाये तो अगर इस्तेहाज़ा क़लीला था तो अपने आपको पाक करे और बाद की नमाज़ के लिए वुज़ू करे। अगर इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता या कसीरा था, तो ग़ुस्ल करे और नमाज़  से पहले वुज़ू करे। इस ग़ुस्ल को ख़ून बंद होने के फ़ौरन बाद  अंजाम दिया जा सकता है, चाहे नमाज़ का वक़्त न भी हुआ हो।
मस्ला न. 404) अगर औरत को यह मालूम न हो कि उसका इस्तेहाज़ा किस क़िस्म का है, तो उसे चाहिए कि नमाज़ पढ़ने से पहले, थोड़ीसी रूई अपनी शर्मगाह में रखे और थोड़ी देर बाद निकाल कर देखे, ताकि पता चल सके कि इस्तेहाज़ा किस क़िस्म का है। जब समझ जाये कि उसका इस्तेहाज़ा तीनों किस्मों में से कौनसा है, तो उस क़िस्म के लिए जो अहकाम बयान किये गये हैं, उन पर अमल करे। अगर उसे इल्म हो कि नमाज़ के वक़्त तक उसके इस्तेहाज़ा में कोई तबदीली नही आयेगी, तो वह नमाज़ के वक़्त से पहले भी इम्तेहान कर सकती है।
405  अगर मुस्तहज़ा औरत अपनी जाँच किये बग़ैर नमाज़ शुरू कर दे तो अगर उसने क़स्दे क़ुरबत  के साथ अपनी शरई ज़िम्मेदारी को पूरा किया हो मसलन उसका इस्तेहाज़ा क़लील हो और उसने इस्तेहाज़ा क़लील वाले काम अंजाम दिये हों तो उसकी नमाज़ सही है और अगर उसने क़स्दे क़ुरबत न किया हो या उसका अमल उसकी शरई ज़िम्मेदारी के मुताबिक़ न हो, मसलन उसका इस्तेहाज़ मुतवस्सित हो और उसने क़लीला वाले अमल अंजाम दिये हों तो उसकी नमाज़ बातिल है।
406   अगर मुस्तहेज़ा औरत अपने बारे में तहक़ीक़ न कर सकती हो तो ज़रूरी है कि जो उसका यक़ीना वज़ीफ़ा हो उसके मुताबिक़ अमल करे, मसलन अगर वह न जानती हो कि उसका इस्तेहाज़ा क़लीला है या मुतवस्सेता, तो उसे इस्तेहाज़ -ए- क़लीला के अमाल अंजाम देने चाहिए। लेकिन अगर वह जानती हो कि पहले तीनों क़िस्मों में से किस क़िस्म का इस्तेहाज़ा था, तो उसे उसी के मुताबिक़ अमल करना चाहिए।
407  अगर इस्तेहाज़ा का ख़ून अपनी जगह से हरकत करे लेकिन जिस्म से बाहर न निकले तो औरत का इस्तेहाज़ा के अहकाम पर अमल करना ज़रूरी नही है। लेकिन अगर अपनी जगह से ख़ारिज हो कर आगे की तरफ़ जारी हो जाये तो चाहे बाहर न निकला हो तब भी इस्तेहाज़ा के अहकाम पर अमल करना लाज़िम है।  
408  अगर मुस्तेहाज़ा औरत को मालूम हो कि वुज़ू या ग़ुस्ल करने के वक़्त से ख़ून बाहर नही आया है और नमाज़ पढ़ने के बाद भी फ़र्ज (योनी) में नही है तो वह दूसरी नमाज़ पढने में देर भी कर सकती है और दूसरी नमाज़ को इसी  वुज़ू या ग़ुस्ल से भी पढ़ सकती है।
409  अगर मुस्तेहाज़ा औरत जानती हो कि नमाज़ क़ज़ा होने से पहले वह बिल्कुल पाक हो जायेगी या जितनी देर ग़ुस्ल व वुज़ू करने और नमाज़ पढ़ने में लगती है उतनी देर ख़ून रुका रहेगा तो उसे ख़ून बंद होने का इन्तेज़ार करना चाहिए और पाक हो कर नमाज़ पढ़नी चाहिए। अगर ख़ून बंद होने का एहतेमाल हो तब भी इन्तेज़ार करना चाहिए।
410  मुस्तेहाज़ -ए- क़लीला को वुज़ू के और मुस्तेहाज़ा -ए- मुतवस्सेता व कसीरा को ग़ुस्ल व वुज़ू के फ़ौरन बाद नमाज़ में मशग़ूल हो जाना चाहिए। लेकिन अज़ान व अइक़ामत कहने और नमाज़ से पहले की दुआओं को पढ़ने में कोई हरज नही है और नमाज़ की हालत में भी क़ुनूत जैसे मुसतहब कामों को अंजाम दिया जा सकता है।
411  अगर मुस्तेहाज़ा औरत ग़ुस्ल और नमाज़ के दरमियान फ़ासला करदे तो उसे दोबारा ग़ुस्ल करके फ़ौरन नमाज़ पढ़नी चाहिए। लेकिन अगर ख़ून फ़र्ज (योनी) के अंदर न आया हो तो दोबारा ग़ुस्ल व वुज़ू करना लाज़िम नही है।
412  मुस्तेहाज़ा औरत पर वाजिब है कि ग़ुस्ल व वुज़ू के बाद जहाँ तक मुमकिन हो रूई के ज़रिये ख़ून को बाहर निकलने से रोके, अगर इसमें कोताही करे और ख़ून बाहर आजाये तो नमाज़ को दोबारा पढ़ना चाहिए, बल्कि एहतियाते वाजिब यह लहै कि दोबारा ग़ुस्ल व वुज़ू करे तब नमाज़ पढ़े।
413  अगर ग़ुस्ल करते वक़्त ख़ून बंद न हो तो ग़ुस्ल सही है। लेकिन अगर ग़ुस्ल  के दरमियान मुतवस्सेता कसीरा में बदल जाये तो दोबारा ग़ुस्ल करना वाजिब है।
414  एहतियाते वाजिब यह है कि रोज़े दार औरत जहाँ तक मुमकिन हो पूरे दिन ख़ून को बाहर निकलने से रोके।
415  वह मुस्तेहाज़ा औरत जिस पर ग़ुस्ल वाजिब है, उसका रोज़ा सिर्फ़ इसी सूरत में सही है कि उस पर नमाज़ के लिए दिन में जो ग़ुस्ल वाजिब हैं उनको अंजाम दे। एहतियाते मुस्तहब यह है कि जिस दिन रोज़ा रखना चाहती हो उससे पहली रात में मग़रिब व इशा से पहले ग़ुस्ल करे।
416  अगर कोई औरत अस्र की नमाज़ के बाद मुस्तेहाज़ा हो जाये और ग़ुरेबे आफ़ताब तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा सही है।
417  अगर नमाज़ से पहले औरत का इस्तेहाज़ा क़लीला से मुतवस्सेता या कसीरा में तबदील हो जाये तो उसे वह काम करने होंगे जो मुतवस्सेता या कसीरा के लिए बयान किये गये हैं। अगर मुतवस्सेता कसीरा में बदल जाये तो इस्तेहाज़ा -ए- कसीरा के काम अंजाम देने होंगे, अगर इस्तेहाज़ा-ए- मुतवस्सेता के लिए ग़ुस्ल कर लिया हो तो उसका कोई फ़ायदा नही है इस्तेहाज़ा- ए- कसीरा के लिए दोबारा ग़ुस्ल करना होगा।
418 अगर नमाज़ के पढ़ते वक़्त औरत का इस्तेहाज़ा –ए- मुतवस्सेता कसीरा में बदल जाये तो नमाज़ को तोड़ कर इस्तेहाज़ा-ए कसीरा के लिए ग़ुस्ल करे और दूसरे काम अंजाम दे फिर उसी नमाज़ को पढ़े। अगर ग़ुस्ल के लिए वक़्त न हो तो तयम्मुम करे, और वुज़ू भी करे और अगर वुज़ू के लिए भी वक़्त न हो तो एक तयम्मुम वुज़ू के बदले करे और अगर तयम्मुम के लिए भी वक़्त न हो तो नमाज़ को न तोड़े बल्कि उसे पूरा करे और एहतियाते वाजिब की बिना पर बाद में उसकी क़     ज़ा भी करे। इसी तरह अगर नमाज़ पढ़ते वक़्त इस्तेहाज़ा -ए- क़लीला मुतवस्सेता या कसीरा में बदल जाये तो उसका भी यही हुक्म है। लेकिन अगर इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता था तो ग़ुस्ल के अलावा वुज़ू भी करना होगा।
419  अगर नमाज़ के दौरान ख़ून आना बंद हो जाये और औरत को यह न पता हो कि अन्दर से भी बंद हो गया है या नही तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ग़ुस्ल, वुज़ू और नमाज़ को दोबारा अंजाम देना चाहिए।
420  अगर मुस्तेहाज़ा -ए- कसीरा मुतवस्सेता हो जाये पहली नमाज़ के लिए कसीरा वाले अहकाम और बाद की नमाज़ के लिए मुतवस्सेता वाले अहकाम अंजाम दे। मसलन अगर ज़ोहर की नमाज़ से पहले इस्तेहाज़ा-ए- कसीरा मुतवस्सेता हो जाये तो ज़ोहर की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करे और अस्र व मगरिब व इशा की नमाज़ के लिए सिर्फ़ वुज़ू करे।
421 अगर हर नमाज़ से पहले मुस्तेहाज़ा –ए-  कसीरा का ख़ून बंद हो जाये और दोबारा शुरू हो तो उसे हर नमाज़ से पहले एक ग़ुस्ल करना चाहिए।
422  अगर इस्तेहाज़ा -ए- कसीरा क़लीला में बदल जाये तो पहली नमाज़ के लिए कसीरा का अमल और दूसरी नमाज़ के लिए क़लीला का अमल अंजाम देना चाहिए। इसी तरह अगर इस्तेहाज़ा-ए-मुतवस्सेता क़लीला में बदल जाये तो पहली नमाज़ के लिए मुतवस्सेता का अमल और बाद की नमाज़ के लिए क़लीला का अमल अंजाम दे।
423  जो काम मुस्तेहाज़ा पर वाजिब हैं (यहाँ तक कि कपड़े या रूई का बदलना) अगर वह उनको तर्क करती है, तो उसकी नमाज़ बातिल है।
424 अगर मुस्तेहाज़ा –ए- क़लीला नमाज़ के अलावा कोई ऐसा काम अंजाम देना चाहे जिसके लिए वुज़ू ज़रूरी हो मसलन क़ुरान के अलफ़ाज़ कतो छूना चाहे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसको वुज़ू करना चाहिए क्योंकि नमाज़ के लिए उसने जो वुज़ू किया था वह काफ़ी नही4 है।
425  मुस्ताहाज़ा औरत के मस्जिदुल हराम, मस्जिदे नबी में जाने, दूसरी मस्जिदों में ठहरने, वाजिब सजदों वाले सूरों को पढ़ने और शौहर के साथ हमबिस्तरी करने में कोई हरज नही है। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि इन कामों से पहले अपना वाजिब ग़ुस्ल अंजाम दे।
426 अगर मुस्तेहाज़ा –ए- कसीरा नमाज़ के वक़्त से पहले क़ुरआन के अलफ़ाज़ को छूना चाहे तो उसे ग़ुस्ल करना चाहिए, लेकिन इस्तेहाज़ा –ए- मुतवस्सेता में अगर उस दिन का ग़ुस्ल कर लिया हो तो वुज़ू करना ही काफ़ी है।
427  मुस्तेहाज़ा औरत पर नमाज़े आयात वाजिब है और नमाज़े आयात पढ़ने के लिए वही काम अंजाम देने होंगे जो हर रोज़ की वाजिब नमाज़ पढ़ने के लिए अंजाम देने पड़ते हैं।
428  अगर हर रोज़ की वाजिब नमाज़ के वक़्त में मुस्तेहाज़ा पर नमाज़े आयात भी वाजिब हो जाये और वह उन दोनों को मिला कर पढ़ना चाहे तो उसे चाहिए कि नमाज़े आयात पढ़ने के लिए उन तमाम कामों को अंजाम दे जो नमाज़े यौमिया के लिए अंजाम देती है। वह एक ग़ुस्ल व वुज़ू से दोनों नमाज़े नही पढ़ सकती।
429  अगर मुस्तेहाज़ा औरत क़ज़ा नमाज़ें पढ़ना चाहे तो उसे हर नमाज़ के लिए वह तमाम काम अंजाम देने होंगे जो अदा नमाज़ के लिए अंजाम देती है।
430  अगर औरत जानती हो कि उससे निकलने वाला ख़ून ज़ख़्म का नही है और शरन हैज़ व निफ़ास के हुक्म में भी नही है, तो उसे इस्तेहाज़ा के अहकाम पर अमल करना चाहिए। यहाँ तक कि अगर उसे शक हो कि यह इस्तेहाज़ा का ख़ून है या कोई दूसरा ख़ून तो अगर उसमें इस्तेहाज़ा की निशानियाँ न भी पाई जाती हो तब भी एहतियाते वाजिब की बिना पर उसे इस्तेहाज़ा के काम अंजाम देने चाहिए।

हैज़

औरत के रहम से जो हर महीने कुछ दिनों तक ख़ून निकलता है उसे हैज़ कहते हैं और जिस औरत को यह ख़ून निकल रहा होता है उसे हाइज़ कहते हैं।
431  हैज़ का ख़ून अक्सर गाढ़ा, गर्म, तेज़ सुर्ख या सुर्ख सियाही लिए हुए होता है और दबाव के साथ हल्की सी जलन के साथ बाहर निकलता है।
432  सैदानियाँ क़मरी साठ साल के बाद और दूसरी तमाम औरतें क़मरी पचास साल के बाद यायसा हो जाती हैं। यानी इस मुद्दत के बाद उनको हैज़ का ख़ून नही आता।
433  अगर किसी लड़की को क़मरी नौ साल से पहले और औरत को यायसा होने के बाद ख़ून आये तो वह हैज़ नही है।
434  हामला या बच्चे को दूध पिलाने वाली औरत के लिए भी मुमकिन है कि हैज़ आ जाये।
435  जो लड़की यह न जानती हो कि अभी नौ साल की हुई है या नही अगर उसे कोई ख़ून आये और उसमें हैज़ की निशानियाँ न पाई जाती हों तो वह हैज़ नही है। यहाँ तक कि अगर उसमें हैज़ की निशानियाँ भी पाई जाती हों तब भी उसे हैज़ नही कहा जासकता।
436  अगर किसी औरत को शक हो कि अभी यायसा हुई है या नही और उसे कोई ऐसा ख़ून आये जिसके बारे में न जानती हो कि यह हैज़ है या कोई और ख़ून तो उसे इस पर बिना रखनी चाहिए कि अभी यायसा नही हुई है।
437  हैज़ की मुद्दत कम से कम तीन दिन और ज़्यादा से ज़्यादा दस दिन है। अगर कोई ख़ून तीन दिन से कम आये तो वह हैज़ नही है।
438  पहले तीन दिन ख़ून लगातार आना चाहिए, अगर दो दिन ख़ून आये तीसरे दिन बंद हो जाये और चौथे रोज़ फिर आये तो वह हैज़ नही है।
439  ज़रूरी नही है कि तीन दिन तक मुसलसल ख़ून बाहर आता रहे बल्कि अगर शुरू में ख़ून बाहर आ जाये और फिर फ़र्ज (योनी) में ख़ून रहे तो काफ़ी है। अगर तीन दिन के अर्से में थोड़ी देर के लिए ख़ून बंद हो जाये और यह मद्दत इतनी कम हो कि यह कहा जा सके कि तीन दिन तक फ़र्ज (योनी) में ख़ून था तो यह हैज़ ही होगा।
440  पहली और चौथी रात में ख़ून का आना ज़रूरी नही है, लेकि दूसरी और तीसरी रात में ख़ून बंद नही होना चाहिए। अगर पहले दिन सूरज निकलने से लेकर तीसरे दिन सूरज छुपने तक मसलसल ख़ून आता रहे या पहले दिन, दिन के बीच से ख़ून आना शुरू हो और चौथे रोज़ उसी वक़्त बंद हो और दूसरी व तीसरी रात में भी ख़ून बंद न हो तो हैज़ है।
441  अगर तीन दिन मुसलसल ख़ून आने के बाद बंद हो जाये और कुछ दिन बंद रहने के बाद फिर आने लगे और ख़ून के आने व बंद होनें की मुद्दत दस दिन से ज़्यादा न हो तो जिन दिनों में ख़ून बंद रहा है वह भी हैज़ के ही दिन हैं।
442  अगर ख़ून तीन दिन से ज़्यादा और दस दिन से कम आये और यह पता न हो कि यह हैज़ है या फ़ोड़े का ख़ून है और यह भी पता न हो कि फ़ोड़ा दाहिनी तरफ़ है यै बाईं तरफ़ तो अगर मुमकिन हो थोड़ी सी रूई फ़र्ज (योनी) में रख़ कर बाहर निकाले और देखे कि किस तरफ़ से ख़ून आ रहा है अगर बाईं तरफ़ से आरहा है तो ख़ूने हैज़ है और अगर दाहिनी तरफ़ से आरहा है तो फ़ोड़े का ख़ून है।
443  अगर ख़ून तीन दिन से ज़्यादा और दस दिन से कम आये और पता न हो कि यह हैज़ का ख़ून है या ज़ख़्म का, तो अगर पहले हाइज़ थी तो हैज़ है और अगर पहले पाक थी तो पाक क़रार दे। अगर भी पता न हो कि पहले हाइज़ थी या पाक तो, जो काम हाइज़ पर हराम हैं उन्हें तर्क करे और जो इबादते पाक औरतें करती हैं उन्हें अंजाम दे।
444  अगर किसी औरत को ख़ून आये और वह शक करे कि यह हैज़ है या निफ़ास तो ्गर उसमें हैज़ की निशानियाँ पाई जाती हैं तो उसे हैज़ क़रार दे।
445  अगर किसी औरत को ख़ून आये और उसे पता न हो कि यह बकारत का ख़ून है या हैज़ का तो उसे अपनी जाँच करनी चाहिए। इस तरह कि थोड़ीसी रूई अपनी शर्मगाह (योनी) में रख कर थोड़ी देर के बाद बाहर निकाले अगर ख़ून सिर्फ़ रूई के किनारों पर लगा हो तो वह ख़ून बकारत का होगा और अगर पूरी रूई ख़ून में भीगी होगी तो ख़ूने हैज़ का होगा।
446   अगर किसी को तीन दिन से कम ख़ून आये और बंद हो जाये और तीन के बाद दोबारा तीन दिन ख़ून आये तो दूसरा ख़ून हैज़ है और पहला ख़ून हैज़ के हुक्म में नही है।

हाइज़ के अहकाम

447 इज़ पर कुछ चीज़ें हराम है।
वह इबादतें जिनके लिए वुज़ू ग़ुस्ल या तयम्मुम की ज़रूरत होती है जैसे नमाज़, लेकिन वह इबादतें जिनके लिए वुज़ू, ग़ुस्ल या तयम्मुम की ज़रूरत न हो उन्हे अंजाम देने में कोई हरज नही है। जैसे नमाज़े जनाज़ा।
वह तमाम काम जो मुजनिब पर हराम हैं।
फ़र्ज (योनी) के रास्ते से जिमाअ (मैथिन) करना कि यह मर्द व औरत दोनों के लिए हराम है। चाहे ख़तने की जगह तक ही अन्दर जाये और लमनी (वीर्य) भी न निकले। बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि ख़तने से कम मिक़दार में भी दाख़िल न करे। हाइज़ औरत की दुबुर में वती (गुदा मैथुन) करना, जबकि वह ऐसा कराने पर राज़ी हो, बहुत ज़्यादा मकरूह है।
448   दिनों में भी जिमाअ (संभोग) करना हराम है जो क़तई तौर पर औरत के हैज़ के दिन न हों, लेकिन शरअन उन्हें हैज़ के दिन क़रार दे रही हो। जिस औरत को दस दिन से ज़्यादा ख़ून आये और बाद में बयान होने वाले मसाइल की बिना पर अपनी आदत के दिनों को हैज़ क़रार दे, उसका शौहर उन दिनों में उससे हमबिस्तरी (संभोग) नही कर सकता।
449  अगर कोई अपनी हाइज़ बीवी के साथ क़ुबुल (योनी) के रास्ते जिमाअ (मैथुन) करे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसे कफ़्फ़ारा देना चाहिए और इसकी मिक़दार इस तरतीब से है।
औरत के हैज़ के दिन तीन हिस्सों में तक़सीम होंगे, अगर मर्द ने पहले हिस्से में जिमाअ (संभोग) किया है तो 18 नुख़ूद सोना, अगर दूसरे हिस्से में जिमाअ (संभोग) किया है, तो 9 नुख़ूद सोना और अगर तीसरे हिस्से में जिमाअ किया है तो साढ़े चार नुख़ूद सोना फ़क़ीर को देना होगा। मसलन अगर किसी औरत को छः दिन क़ून आता है और उसका शौहर उससे पहली दूसरी रात या दिन में जिमाअ करे तो उसे 18 नुख़ूद सोना देना होगा। अगर तीसरी, चैथी रात या दिन में जिमाअ करे तो 9 नुख़ूद और अगर पाँचवीं, छटी रात या दिन में जिमाअ करे तो साढ़े चार नुख़ूद सोना देना होगा।
450  अगर हाइज़ औरत के साथ दुबुर में वती (गुदा मैथुन) की जाये तो कोई कफ़्फ़ारा नही है।
451  अगर जिमाअ करने और फ़क़ीर को कफ़्फ़ारा देने के वक़्त में सोने की क़ीमत में फ़र्क़ आ जाये तो फ़क़ीर को वही क़ीमत दी जायेगी जो कफ़्फ़ारा देते वक़्त सोने की क़ीमत होगी।
452  अगर कोई अपनी बीवी से हैज़ की हालत में पहले, दूसरे और तीसरे तीनों हिस्सों में जिमाअ (संभोग) करे तो उसे तीनों कफ़्फ़ारे देने होंगे यानी उसे साढ़े इकत्तीस नुख़ूद सोना देना होगा।
453  अगदर इंसान हैज़ की हालत में जिमाअ करे और उसका कफ़्फ़ारा देने के बाद फिर जिमाअ (संभोग) करे तो उसे दोबारा कफ़्फ़ारा देना होगा।
454  अगर इंसान हैज़ वाली औरत से कई बार जिमाअ करे और उनके बीच में कोई कफ़्फ़ारा न दे तो एहतियाते वाजिब यह है कि हर जिमाअ (संभोग) के लिए एक कफ़्फ़ारा दे।
455  अगर मर्द को जिमाअ (संभोग) करते वक़्त पता चले कि औरत हाइज़ हो गई है तो उसे उससे फ़ौरन अलग हो जाना चाहिए, अगर अलग नही होगा तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसे कफ्फ़ारा देना होगा।
456  अगर कोई हाइज़ औरत से ज़िना (अनैतिक संभोग) करे या किसी नामहरम हाइज़ औरत को अपनी बीवी समझते हुए उससे जिमाअ (संभोग) करे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर कफ़्फ़ारा अदा करे।
457  अगर कोई कफ़्फ़ारा न दे सकता हो तो एक इंसान की ख़ुराक़ सदक़ा दे और अगर यह भी न कर सकता हो तो इस्तग़फ़ार करे।
458  हैज़ की हालत में औरत को तलाक़ देना बातिल है। इसका पूरा ज़िक्र तलाक़ के मसाइल में बयान होगा।
459  अगर औरत कहे कि मैं हाइज़ हूँ, या कहे कि मैं हैज़ से पाक हो गई हूँ, तो उसकी बात को क़बूल करना चाहिए।
460  अगर औरत नमाज़ पढ़ते वक़्त हाइज़ हो जाये तो उसकी नमाज़ बातिल है।
461  अगर औरत नमाज़ की हालत में शक करे कि मैं हाइज़ हुई हूँ या नही तो उसे चाहिए कि अपने शक की परवा  न करे और नमाज़ को तमाम करे। लेकिन अगर नमाज़ के बाद पता चले कि नमाज़ पढ़ते हुए हाइज़ हो गई थी तो जो नमाज़ पढ़ी है वह बातिल है।
462   जब औरत को हैज़ का ख़ून आना बंद हो जाये तो उस पर वाजिब है कि नमाज़ और उन दूसरी इबादतों को अंजाम देने के लिए जिनके लिए वुज़ू, ग़ुस्ल या तयम्मुम की ज़रूरत होती है, ग़ुस्ल करे। यह ग़ुस्ल, ग़ुस्ले जनाबत की तरह है, ग़ुस्ले जनाबत की तरह ग़ुस्ते हैज़ के बाद भी वुज़ू की ज़रूरत नही है। लेकिन बेहतर यह है कि नमाज़ पढ़ने के लिए ग़ुस्ल से पहले या ग़ुस्ल के बाद वुज़ू भी कर लिया जाये। अगर ग़ुस्ल से पहले वुज़ू किया जाये तो अफ़ज़ल है।
463  हैज़ का ख़ून बंद होने के बाद औरत को तलाक़ देना सही है चाहे उसने ग़ुस्ल न किया हो और उसका शौहर उससे जिमाअ भी कर सकता है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि ग़ुस्ल करने से पहले उसके साथ जिमाअ करने से परहेज़ किया जाये। लेकिन वह दूसरे काम जो हैज़ की हालत में उस पर हराम थे जैसे क़ुरआन के अलफ़ाज़ को छूना, मस्जिद में ठहरना वगैरह, उस पर उस वक़्त तक हलाल नही होंगे जब तक गुस्ल न करले।
464  अगर ग़ुस्ल के लिए पानी कम हो लेकिन उससे वुज़ू किया जा सकता हो तो ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करना चाहिए और उस पानी से वुज़ू कर लेना चाहिए। अगर पानी इतना कम हो कि उससे वुज़ू भी न किया जा सकता हो तो दो तयम्मुम करने चाहिए एक ग़ुस्ल के बदले और दूसरा वुज़ू के बदले।
465  जो नमाज़े हैज़ की हालत में छूट गई हैं उनकी क़ज़ा नही है। लेकिन हैज़ की हालत में छुटने वाले वाजिब रोज़ों की क़ज़ा है।
466  जब नमाज़ का वक़्त हो जाये और यह ख़तरा हो कि अगर नमाज़ पढ़ने में देर की तो हैज़ शुरू हो जायेगा तो फ़ौरन नमाज़ पढ़नी चाहिए।
467  अगर औरत नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने के बाद नमाज़ न पढ़े और इतनी देर गुज़रने के बाद हाइज़ हो जाये, जितनी देर में एक नमाज़ के वाजिबात अदा किये जा सकते हों, तो उस पर उस नमाज़ की क़ज़ा वाजिब। लेकिन तेज़ और धीमे पढ़ने और दूसरी तमाम बातों को भी ध्यान में रखना होगा। मसलन जो औरत मुसाफ़िर न हो अगर अव्वले वक़्त नमाज़ न पढ़े और हाइज़ हो जाये तो उस पर इस नमाज़ की कज़ा उस वक़्त वाजिब है जब ज़ोहर के अव्वले वक़्त से इतना वक़्त गुज़र जाये जिसमें चार रकत नमाज़ पढ़ी जा सकती हो। मुसाफ़िर औरत पर उस वक़्त कज़ा वाजिब होगी जब अव्वले ज़ोहर से इतना वक़्त गुज़र जाये जिसमें दो रकत नमाज़ पढ़ी जा सकती हो, इसके साथ साथ दूसरी शर्तों को भी मद्दे नज़र रख़ा जायेगा। बस अगर अव्वले वक़्त से इतना वक़्त गुज़र जाये कि जिसमें नमाज़ के मुक़द्दमात को फ़राहम करके नमाज़ पढ़ी जा सकती हो और हाइज़ हो जाये तो उस नमाज़ की क़ज़ा वाजिब है, वरना वाजिब नही है।
468   अगर नमाज़ के आख़िरी वक़्त में औरत को हैज़ का ख़ून आना बंद हो जाये और नमाज़ के मुकद्दमात फ़राहम करने (मसलन लिबास आमादा करने या उसको धोने) और एक रकत या उससे ज़्यादा नमाज़ पढ़ने का वक़्त बाक़ी हो तो नमाज़ पढ़नी चाहिए और अगर न पढ़े तो उसकी क़ज़ा वाजिब होगी।